अंगूर की खेती | grapes farming

अंगूर की खेती सबसे ज्यादा भारत देश मे महाराष्ट्र राज्य मे की जाती है। यह राज्य अंगूर के उत्पादन मे अग्रणी राज्य है, आज के समय में उन्नत तकनीक का सहारा लेकर किसान खेती से बढ़िया मुनाफा कमा रहे है।  भारत में महाराष्ट्र राज्य के आलावा कर्नाटक, पंजाब, हरियाणा , मध्यप्रदेश राज्य में भी अंगूर की खेती आसानी से की जा रही है। अंगूर का उपयोग फलो के साथ ही किशमिश, शरबत आदि के निर्माण में होने के कारण हमेशा अच्छी मांग रहती है। और अंगूर की सीजन में किसान को अंगूर का बाज़ार भाव भी बढ़िया मिल जाता है। जिससे इस खेती से लाखो में मुनाफा कमाया जा सकता है।

अंगूर की खेती के लिए जलवायु

इस खेती को करने के लिए न ही अधिक ठंडे व न ही ज्यादा गर्म जलवायु की आवश्यकता होती है। यानि की सामान्य तापमान पर अंगूर की खेती आसानी से की जा सकती है। इस खेती को 35 डिग्री से 38 डिग्री सेन्टीग्रैड तापमान की आवश्यकता होती है। इस फसल को कम बारिश की आवश्यकता होती है। अधिक ठंड पड़ने पर अंगूर की खेती की नुकसान पहुचता है।

अगर कोई किसान एक एकड़ मे इसकी खेती  खेती को लगाना चाहता है तो अंगूर को लगाने से फल लगकर तैयार होने मे 5 से 6 लाख का खर्च आता है।

इस खेती के लिए उपयुक्त भूमि

बढ़िया जल निकास वाली दोमट मिट्टी को अंगूर की खेती के लिए उपयुक्त माना गया है। चिकनी मिट्टी मे अंगूर की खेती करने से बचना चाहिए। भारी मिट्टी मे अंगूर की खेती करने से जल निकास उचित नहीं होने से अंगूर कर बगीचे पर उत्पादन पर प्रभाव पड़ता है। जमीन का ph मान 6 से 7 होना चाहिए

अंगूर की खेती

अंगूर की उन्नत किस्मे

अंगूर की खेती से अच्छा मुनाफा कमाने के लिए जब भी आप अंगूर की किस्म का चुनाव कर रहे है आपको अंगूर की बढ़िया पैदावार देने वाली किस्म का ही चुनाव करना चाहिए। ताकि आपको साल भर की गई अंगूर की खेती से अच्छा पैदावार मिल सके।

पूसा सिडलेस – अंगूर की यह किस्म बहुत ही बढ़िया किस्म मानी जाती है। इस किस्म से प्राप्त अंगूर के गुच्छे का वजन लगभग 250 ग्राम तक होता है। इस किस्म की अंगूर फरवरी महीने से मार्च के महीने पककर तैयार हो जाती है।

थॉमसन सीडलेस किस्म – अंगूर की थॉमसन सीडलेस किस्म को मुख्य रूप से दक्षिण व पश्चिम के भागों मे आसानी से उगाया जा सकता है। इस किस्म से लगने वाले अंगूर के गुच्छे माध्यम व बड़े आकार के होते है। इस किस्म को लगाने के 5 से 6 साल के बाद अंगूर की पैदावार मे थोड़ी कमी आ जाती है।

इसी के साथ अंगूर की बाजार मे कही किस्म मोजूद है। जिन्हे आप अपने क्षेत्र की जलवायु के अनुसार अंगूर की किसी एक बढ़िया पैदावार देने वाली किस्म को चुन सकते है।

पौधे तैयार करना

अंगूर के नए पौधों को अंगूर की बैल की कटाई – छटाई से प्राप्त टहनी से की जाती है। टहनी से अंगूर के नए पौधों को लगाने का कार्य आपको जनवरी के महीने मे करना चाहिए। ध्यान रखे आप जिस भी टहनी को उगा रहे है व स्वस्थ होनी चाहिए। टहनी 4 से 5 गांठ वाली होनी चाहिए। पौधों को लगते समय गड्डा खोदकर लगाए। गड्डो मे सड़ी हुई गोबर खाद व अन्य उर्वरक जरूर डाले। एक पौधे से दूसरे पौधे के बीच जगह जरूर रखे, ताकि फलों की कटिंग व कीटनाशक दवा छिड़काव का कार्य आसानी से किया जा सके।

गराफ्टिंग का कार्य – अगर आपने जनवरी के महीने मे खेत मे अंगूर का पौधा लगा दिया है तो, आपको अक्टूबर महीने मे बेल पर गराफ्टिंग का कार्य करना चाहिए। किसी भी बढ़िया किस्म की कलम को आपको बैल के जमीन के कुछ ऊपर तिरछा कट लगाकर कलम लगा देनी चाहिए। कलम लगाते समय बैल को सहारा देने के लिए बाँस की लकड़ी को अंगूर की बैल के पास गाड दे।

अंगूर की खेती

पण्डाल तैयार करना

अंगूर की बैल को ऊपर फेलाने के लिए पण्डाल प्रणाली सबसे प्रसिद्ध है। पण्डाल बनाने के लिए लोहे के Y आकर के फ्रेम बना ले। लोहे के फ्रेम को अंगूर की बैल की लाइन में जगह – जगह लगा दे। फिर तार का जाल बनाकर अंगूर की बैल की ऊपर जल पर फैला दे।  पण्डाल की उचाई 2 से 2.5 मीटर की रखे।

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कटाई छटाई का कार्य

इस खेती मे लगातार पैदावार लेने के लिए समय – समय पर बैल की कटाई छटाई का कार्य जरूर करे। बैल की कटाई छटाई हेतु अप्रैल के महीने मे बैल की सभी हरी पत्तियों को हटा दिया जाता है। 1 महीने के बाद बैल पर Lihocin का छिड़काव करे। इसके बाद बैल के जब 7 पत्तिया आ जाती है। तब ऊपर की कुपल तोड़ दे। फिर मुंह पर नया सिरा शुरू हो जाता है। जैसे ही 10 से 12 नई पत्तिया आ जाती है। आगे से कुपल को तोड़ दे। सिपतंबर महीने मे बैल की रीवर्स कटिंग करने के बाद बैल की आँखों पर पेस्ट का लेप कर दे।

सिचाई

इस खेती को नवंबर और दिसंबर महीने मे ज्यादा सिचाई की आवश्यकता नहीं होती है। जैसे ही आप बैल की कटाई छटाई कर देता है तब आपको सिचाई जरूर करनी चाहिए। जब अंगूर के फल लगना शुरू हो जाए यानि मार्च से मई महीने मे अंगूर की खेती को सिचाई की आवश्यकता होती है। अंगूर की खेती मे आपको 7 से 10 दिन के अंतराल पर सिचाई करते रहना चाहिए।

अगर आप इस खेती मे सिचाई पर ध्यान नहीं देते है तो अंगूर की पैदावार पर इसका सीधा असर पड़ता है। सिचाई करने के लिए आप ड्रिप सिचाई प्रणाली को भी काम मे ले सकते है। अंगूर के फल जब पक जाए उस समय आपको सिचाई का कार्य बंद कर देना चाहिए। अन्यथा फल फट जाते है व टूटकर गिरना शुरू हो जाते है।

खाद व उर्वरक

अंगूर की खेती से पर्याप्त मात्रा मे पैदावार लेने के लिए खाद एवं उर्वरक पर ध्यान देना बहुत जरूरी है। छटाई करने के बाद आपको यानि जनवरी महीने के अंत मे नाइट्रोजन, फास्फोरस, व पोटाश को उर्वरक के रूप मे जरूर डाले।

अगर अंगूर की बैल 5 साल की है तो आपको 500 ग्राम तक नाइट्रोजन व 600 से 700 ग्राम पोटाश, 650 ग्राम पोटेशियम सल्फेट के साथ ही 60 किलोग्राम तक पशुओ की सड़ी हुई खाद देनी चाहिए।

अंगूर की खेती मे उपज व पैदावार

अगर आपने उन्नत व आधुनिक तकनीक से अंगूर की खेती की है। सही समय पर बैल की कटाई छटाई का कार्य किया है तो 3 साल बाद आप अंगूर की पैदावार प्राप्त कर सकते है। अंगूर की पैदावार 1 साल मे 1 बार ही मिलती है। अंगूर का सीजन सिपतंबर महीने से अप्रैल महीने तक रहता है। इस समय अंगूर का अच्छा भाव मिल जाता है। प्रति एकड़ अंगूर की पैदावार 20 से 25 टन तक होती है। अंगूर की खेती मे आप 2 एकड़ मे खेती को लगाकर हर साल 15 से 20 लाख की कमी कर सकते है।

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